2019 लोक सभा चुनाव : संभावनाओं का आकलन

2019 लोक सभा चुनाव : संभावनाओं का आकलन

आने वाले लोक सभा चुनाव का बिगुल फूंका जा चुका है।  इस बार बिल्कुल खुल्ला खेल फरुख्वादी रहेगा – राजनीतिक विश्लेषक सब अपने-अपने हिसाब से आकलन कर रहे है। सारी राजनीतिक पार्टियाँ  मतदाताओं को बंधुआ मजदूर मान कर चल रही हैं। यह लोकतंत्र की विडंबना नहीं तो और क्या है?

गठबन्धन करके कई पार्टियां ये सोचती हैं कि वो एक दूसरे को वोट ट्रांसफर करा देंगी- जैसे वोटर महज़ एक खरीदा गया वस्तु हो ! जहां तक ये आकलन लगाने की बात है – आने वाले चुनाव में क्या होगा? – यह यकीनन तौर पर कहना मुश्किल नज़र आ रहा है। पिछले एक महीने से राजनीतिक क्षेत्र  में जो घटनाएं घट रही है, उसका कहीं न कहीं लाभ वर्तमान सरकार को होने जा रहा है।

महागठबंधन / बुआ-भतीजा और ममता दीदी की राजनीति

आपने दो महीने पहले Akhilesh Yadav और Mayawati के ‘बुआ-भतीजा’ (सपा-बसपा) गठबंधन के बारे में तो ज़रूर सुना होगा। दोनों ने उत्तर प्रदेश में वोटों का ट्रेलर सबको दिखा दिया। यह हाल केवल उत्तर प्रदेश का नहीं बल्कि पश्चिम बंगाल का भी है जहाँ Mamata Banerjee एक कमिश्नर के बचाव में धरने पर बैठ गयीं थीं।  और उनके रैली में देश की तमाम छोटी-बड़ी क्षेत्रीय पार्टियां और उनके नेता जैसे Chandrababu Naidu और Kanimozhi भी शामिल हो चुके हैं।

बुरे-से-बुरे हालत में भी BJP की सीटें 170 से कम नहीं दिखाई पड़ रहीं हैं। उत्तर प्रदेश पर सबकी नजर है। उत्तर प्रदेश पर वापस आएं तो, यहाँ की कड़वी सच्चाई यह है कि Shivpal Singh Yadav की पार्टी भले ही कोई सीट नहीं जीतती दिखाई देती हो, लेकिन महागठबंधन के मंसूबों पर पानी ज़रूर फेर सकती है। हालांकि समाचार जगत में शिवपाल की संगठन क्षमता को कमतर आंका जा रहा है जो कि अपने आप में एक राजनीतिक भूल ही कही जायेगी।

BJP कहाँ खरी उतरती है?

मोटे तौर पर सरकार बनाने में कोई कसर बाकी न रह जाए, इसके लिए BJP को 50 से 80 सांसदों को जोड़ना पड़ेगा। इसके लिए पार्टी अपने अध्यक्ष Amit Shah पर पूरा भरोसा कर सकती है। हालांकि, कुछ उप-चुनाव तथा तीन राज्यों में हुए विधान सभा चुनावों ने इनके मनोबल को गिराया है। परिणाम स्वरूप बिहार में अपने अधिकार से काफी कम सीटों पर समझौता किया गया। महाराष्ट्र में भी बीजेपी ने Shiv Sena  के साथ गठबंधन बना लिया। उसी ढंग से AIADMK के साथ तमिलनाडु में गठबंधन का होना ये बताता है कि पार्टी अब कोई जोखिम नहीं लेने जा रही है।

कांग्रेस के लिए संभावनाएं

जहां तक Congress का प्रश्न है Priyanka Gandhi के आने से पुराने कांग्रेसियों के चेहरे पर चमक तो अवश्य दिखाई देती है। लेकिन जिस ढंग से Robert Vadra,Chidambaram, आदि कानूनी शिकंजे में फंसते चले जा रहे है – ये कहना मुश्किल होगा कि ये चमक कब तक बनी रहेगी। क्या Rahul Gandhi का राफेल राग और ‘चौकीदार चोर है‘ का नारा कांग्रेस को काफी मंहगा पड़ेगा? यह तो आगामी चुनाव ही दिखलायेंगे। हालांकि यह तय है जिस ढंग से Sonia Gandhi  का PM Modi को ‘मौत का जादूगर’ बोलना कांग्रेस को मंहगा पड़ा था उसी तरह लोक सभा चुनाव में भी इसका कुछ असर देखने को मिलेगा। कांग्रेस के अलावा भी कई मोदी विरोधी पार्टियां हैं लेकिन उन्हें देश के प्रधानमंत्री की ईमानदारी पर शक नहीं है।

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